इस पावन देव स्थान की पूजा अर्चना वैदिक कालसे होतीं आई है, परन्तु यह स्वयं भू प्रगट शिव लिंग खुलें आकाश मे सर्दी गर्मी को सहन करते हुए श्रद्धालुओं को आर्शीवाद देता रहा, जयोहि परम धर्मो हिन्दू सिक्ख समानता के प्रतीक महा राजा रणजीत सिंह जी ने राजगद्दी संभाली तो अपने सम्पूर्ण राजय मे भ्रमण किया तथा राज्य सीमा के अन्तर्गत आने वाले धार्मिक स्थल के सुधार के लिए सरकारी कोष से सेवा करने का संकल्प किया, इस आद शिवलिंग के दर्शन करके महाराजा रणजीत सिंह जी का ह्रदय परफुलित हो गया, उनहोंने तुरंत इस आद शिवलिंग पर शिव मन्दिर बनवाकर विधिपूर्वक पूजा अर्चना की कहा जाता है कि इस स्थान के निकट प्राचीन कुएं का जल महाराजा रणजीत सिंह अपने काल में शुभ कार्य प्रारम्भ करने के लिए यहाँ से मंगवाते थे कयोंकि यह जल बडा पावन व रोग निवारक माना जाता रहा है,
साधु महात्मा इस देव स्थान को तान्त्रिक स्थान मानते हैं उनका कथन है कि यह विशाल शिवलिंग अषटकोणीय है मुख्य मन्दिर, समीपवर्ती कुआं ष बड़ी समाधि तथा परिक्रमा मे बना हुआ चबूतरा अषटकोणीय है, यह शिव मन्दिर एक पहाड़ी पर सिथत है और मन्दिर की कुछ दूरी छौछ पशिचम दिशा की और बहती है दक्षिण दिशा में व्यास नदी आकषरक व मनोहारी दृश्य दर्शाती हुई एक दूसरे मे विलीन हो जाती है इस मन्दिर के परागण मे खडे होकर दूर दूर तक मैदानी भू भाग दिखाई देता है जिसका भग्त जन आनन्द लेते हुए तथा प्रभु चरणो मे श्रद्दा सुमन भेंट करते हुए अपने भावी जीवन को सफल करने की कामना करते हैं इस देव स्थान की पवित्रता व महानता एवं शक्ति के अनुरूप ही इसकी मान्यता व प्रसिद्धि दिन प्रति दिन बढती जा रही हैं
यह शिव भोले नाथ जी
महाराजा रणजीत सिंह द्वारा महादेव मंदिर का निर्माण?
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